Saturday, January 9, 2016

हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क


एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं..
================
वैज्ञानिक कारण..!
===========

एक दिन डिस्कवरी पर
जेनेटिक बीमारियों से
सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम था

उस प्रोग्राम में

एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की
जेनेटिक बीमारी न हो
=============
इसका एक ही इलाज है
==============
और वो है
"सेपरेशन ऑफ़ जींस"
=============
मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में
विवाह नही करना चाहिए
क्योकि
नजदीकी रिश्तेदारों में
जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता
और
जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे
हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
एल्बोनिज्म होने की
100% चांस होती है ..

फिर बहुत ख़ुशी हुई
जब उसी कार्यक्रम में
ये दिखाया गया की
आखिर
"हिन्दूधर्म" में
********
हजारों-हजारों सालों पहले
***************
जींस और डीएनए के बारे में
****************
कैसे लिखा गया है ?
************
हिंदुत्व में गोत्र होते है
*************
और
एक गोत्र के लोग
आपस में शादी नही कर सकते
ताकि
जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. ******************
उस वैज्ञानिक ने कहा की
===============
आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की
********************
"हिन्दूधर्म ही"
*********
विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो
*******************
"विज्ञान पर आधारित" है !
****************

हिंदू परम्पराओं से जुड़े
%%%%%%%%%
ये वैज्ञानिक तर्क:
%%%%%%%
1-
कान छिदवाने की परम्परा:
***************
भारत में लगभग सभी धर्मों में
कान छिदवाने की
परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि
इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है।
जबकि
डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली
अच्छी होती है और
कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का
रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2-
माथे पर कुमकुम/तिलक
%%%%%%%%%%
महिलाएं एवं पुरुष माथे पर
कुमकुम या तिलक लगाते हैं
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
आंखों के बीच में
माथे तक एक नस जाती है।
कुमकुम या तिलक लगाने से
उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है।
माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है,
तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है।
इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

3-
जमीन पर बैठकर भोजन
%%%%%%%%%%
भारतीय संस्कृति के अनुसार
जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
पलती मारकर बैठना
************
एक प्रकार का योग आसन है।
******************
इस पोजीशन में बैठने से
**************
मस्त‍िष्क शांत रहता है और
भोजन करते वक्त
अगर दिमाग शांत हो तो
पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही
खुद-ब-खुद दिमाग से 1 सिगनल
पेट तक जाता है, कि
वह भोजन के लिये तैयार हो जाये

4-
हाथ जोड़कर नमस्ते करना
%%%%%%%%%%%

जब किसी से मिलते हैं तो
हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
जब सभी उंगलियों के शीर्ष
एक दूसरे के संपर्क में आते हैं
और उन पर दबाव पड़ता है।
एक्यूप्रेशर के कारण उसका
सीधा असर
हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है,
ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें।
दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं
तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते।
अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

5-
भोजन की शुरुआत तीखे से और
%%%%%%%%%%%%
अंत मीठे से
%%%%%
जब भी कोई धार्मिक या
पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो
भोजन की शुरुआत तीखे से और
अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
तीखा खाने से
हमारे पेट के अंदर
पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं
इससे
पाचन तंत्र ठीक से संचालित होता है
अंत में
मीठा खाने से
अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है
इससे पेट में जलन नहीं होती है

6-
पीपल की पूजा
%%%%%%
तमाम लोग सोचते हैं कि
पीपल की पूजा करने से
भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
इसकी पूजा इसलिये की जाती है,
ताकि
इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े
और
उसे काटें नहीं
पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो
रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है

7-
दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना
%%%%%%%%%%%%%
दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है
तो लोग कहते हैं कि
बुरे सपने आयेंगे
भूत प्रेत का साया आयेगा,poorvajon ka esthaan,आदि
इसलिये
उत्तर की ओर पैर करके सोयें
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
जब हम
उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं,
तब
हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है।
शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा
दिमाग की ओर संचारित होने लगता है
इससे अलजाइमर,
परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है
यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है

8-
सूर्य नमस्कार
%%%%%%
हिंदुओं में
सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते
नमस्कार करने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
पानी के बीच से आने वाली
सूर्य की किरणें जब
आंखों में पहुंचती हैं तब
हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है

9-
सिर पर चोटी
%%%%%%
हिंदू धर्म में
ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे
आज भी लोग रखते हैं
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है
उस जगह पर
दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं
इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है
और
इंसान को क्रोध नहीं आता
सोचने की क्षमता बढ़ती है।

10-
व्रत रखना
%%%%
कोई भी पूजा-पाठ, त्योहार होता है तो
लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
आयुर्वेद के अनुसार
व्रत करने से
पाचन क्रिया अच्छी होती है और
फलाहार लेने से
शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है
यानी
उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं
शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से
कैंसर का खतरा कम होता है
हृदय संबंधी रोगों,मधुमेह,आदि रोग भी
जल्दी नहीं लगते

11-
चरण स्पर्श करना
%%%%%%%
हिंदू मान्यता के अनुसार
जब भी आप किसी बड़े से मिलें तो
उसके चरण स्पर्श करें
यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं
ताकि वे बड़ों का आदर करें
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा
हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए
एक चक्र पूरा करती है
इसे
कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं
इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है
या तो
बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक
या फिर
छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक

12-
क्यों लगाया जाता है सिंदूर
%%%%%%%%%%%
शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
सिंदूर में
हल्दी,चूना और मरकरी होता है
यह मिश्रण
शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है
चूंकि
इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं
इसीलिये
विधवा औरतों के लिये
सिंदूर लगाना वर्जित है
इससे स्ट्रेस कम होता है।

13-
तुलसी के पेड़ की पूजा
%%%%%%%%%
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है
सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क-
%%%%%%
तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है
लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा तो
इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और
उससे बीमारियां दूर होती हैं।

अगर पसंद आया
तो शेयर कीजिये
अगर
हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क
आपको वाकई में पसंद आये हैं

मूली के उपयोग ओर लाभ फायदे


निरोगी काया अनमोल रत्न

क्‍या आपको पता है कि मूली जो कि घर-घर में सलाद और सब्‍जी के रूप में खाई जाती है, आपकी स्मरण शक्ति बढ़ा सकती है। इसमें विटामिन ए पाया जाता है जिससे दांतों को मजबूती मिलती है। मूली का सेवन बालों को गिरने से रोकता है। इसमें मजबूत विटामिन बी और विटामिन सी भी नर्वस सिस्टम को भी मजबूत करता है। यह सब्‍जी जमीन के अंदर पैदा होती है। यह पूरे विश्‍व भर में उगाई एंव खायी जाती है। मूली की अनेक प्रजातियाँ हैं जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। मूली कच्ची खायें या इस के पत्तों की सब्जी बनाकर खाएं, हर प्रकार से बवासीर में लाभदायक है। गर्दे की खराबी से यदि पेशाब का बनना बन्द हो जाए तो मूली का रस दो औंस प्रति मात्रा पीने से वह फिर बनने लगता है। मूली खाने से मधुमेह में लाभ होता है। एक कच्ची मूली नित्य प्रातः उठते ही खाते रहने से कुछ दिनों में पीलिया रोग ठीक हो जाता है। गर्मी के प्रभाव से खट्टी डकारें आती हो तो एक कप मूली के रस में मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है।

पेशाब कम बनना :-
गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब का बनना बंद हो जाए तो मूली का रस 50 मिलीलीटर रोजाना पीने से, पेशाब फिर बनने लगता है।
आधा गिलास मूली के रस का सेवन करने से पेशाब के साथ होने वाली जलन और दर्द मिट जाता है।

पेट में दर्द :-
1 कप मूली के रस में नमक और मिर्च डालकर सेवन करने से पेट साफ हो जाता है और पेट का दर्द भी दूर हो जाता है।
मूली का लगभग 1 ग्राम के चौथे भाग के रस में आवश्यकतानुसार नमक और 3-4 कालीमिर्च का चूर्ण डालकर 3-4 बार रोगी को पिलाने से पेट के दर्द में लाभ मिलता है।
10 मिलीलीटर मूली का रस, 10 ग्राम यवक्षार, 50 ग्राम हिंग्वाष्टक चूर्ण, 50 ग्राम सोडा बाइकार्बोनेट, 2 ग्राम नौसादर, 10 ग्राम टार्टरी को मिलाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 3 ग्राम पानी के साथ खाने से हर प्रकार का पेट का दर्द दूर हो जाता है।
100 मिलीलीटर मूली का रस, 200 ग्राम घीकुंवार का रस, 50 मिलीलीटर अदरक का रस, 20 ग्राम सुहागे का फूल, 20 ग्राम नौसादर ठीकरी, 20 ग्राम पांचों नमक, 10-10 ग्राम चित्रकमूल, भुनी हींग, पीपल मूल, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, भुना जीरा, अजवाइन, लौह भस्म और 150 ग्राम पुराना गुड़। सभी औषधियों को पीसकर चूर्ण बनाकर मूली, घीकुंवार और अदरक के रस में मिलाकर, अमृतबान (एक बर्तन) में भरकर, अमृतबान का मुंह बंद करके 15 दिन धूप में रखें। 15 दिन बाद इसे छानकर बोतल में भर लें, आवश्यकतानुसार इस मिश्रण को 6-10 ग्राम तक लगभग 30 मिलीलीटर पानी में मिलाकर भोजन के बाद सेवन करने से पीलिया, मंदाग्नि, भूख न लगना, कब्ज और पेट में दर्द आदि पेट से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं। मासिक-धर्म के कष्ट के साथ आता हो या अनियमित हो तो इस मिश्रण को 2 चाय वाले चम्मच-भर सुबह-शाम 3 सप्ताह तक नियमित रूप से सेवन करना लाभदायक है।
मूली के रस में कालीमिर्च और 1 चुटकी काला नमक मिलाकर खाने से लाभ होता है।
मूली के रस में काला या सेंधा नमक मिलाकर प्रयोग करने से पेट की पीड़ा में राहत मिलती है।
मूली की राख, करेला का रस, साण्डे की जड़ का रस, गडतूम्बा का रस को 10-10 ग्राम की मात्रा में मिलाकर रख लें। इस मिश्रण को दिन में 3 बार पीने से पीलिया, मधुमेह, पेट का दर्द, पथरी, औरतों के पेट में गैस का गोला होना, शरीर का मोटापा, पेट में कब्ज के कारण रूकी हुई वायु  तथा अजीर्ण आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
20 से 40 मिलीलीटर मूली के पत्तों का रस सुबह-शाम सेवन करने से पेट के दर्द में आराम होता है।
मूली के रस में नींबू का रस और सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से वायु विकार से उत्पन्न पेट दर्द समाप्त हो जाता है।

मधुमेह (डायबिटिज) :-
मूली खाने से या इसका रस पीने से मधुमेह में लाभ होता है।
आधी मूली का रस दोपहर के समय मधुमेह रोगी को देने से लाभ होता है।

पीलिया (कामला, पाण्डु) :-
एक कच्ची मूली रोजाना सुबह सोकर उठने के बाद ही खाते रहने से कुछ ही दिनों में ही पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
125 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में 30 ग्राम चीनी मिलाकर सुबह के समय रोगी को पिलाएं, इसे पीते ही लाभ होगा और 1 सप्ताह में रोगी को आराम मिल जाएगा।
मूली में विटामिन `सी´, लौह, कैल्शियम, सोडियम, मैग्नेशियम और क्लोरीन आदि कई खनिज लवण होते हैं, जो लीवर (जिगर) की क्रिया को ठीक करते हैं। अत: पाण्डु (पीलिया) रोग में मूली का रस 100 से 150 मिलीलीटर की मात्रा में गुड़ के साथ दिन में 3 से 4 बार पीने से लाभ होता है।
मूली का रस 10-15 मिलीलीटर 1 उबाल आने तक पकाएं। बाद में उतारकर 25 ग्राम खांड या मिश्री मिलाकर पिलाएं, साथ ही मूली और मूली का साग खिलाते रहने से पीलिया ठीक हो जाता है।
सिरके में बने मूली के अचार के सेवन से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
लगभग आधा से 1 ग्राम मण्डूरभस्म, लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लौह भस्म को शहद के साथ रोगी को चटायें। फिर ऊपर से 100 मिलीलीटर मूली के रस में चीनी मिलाकर पिलायें। इसे रोजाना सुबह-शाम पिलाने से 15-20 दिनों में पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
मूली के ताजे पत्तों को पानी के साथ पीसकर उबाल लें इसमें दूध की भांति झाग ऊपर आ जाता है, इसको छानकर दिन में 3 बार पीने से कामला (पीलिया) रोग मिट जाता है।
पत्तों सहित मूली का रस निकाल लें, फिर दिन में 3 बार 20-20 ग्राम की मात्रा में पीने से पीलिया रोग में लाभ होता हैं।
70 मिलीलीटर मूली के रस में 40 ग्राम शक्कर (चीनी) मिलाकर पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
60 मिलीलीटर मूली के पत्ते का रस व 15 ग्राम खांड मिलाकर पीने से पीलिया रोग में आराम आता है।
मूली की सब्जी का सेवन करने से पीलिया रोग मिट जाता है।
मूली के 100 मिलीलीटर रस में 20 ग्राम शक्कर मिलाकर पीने से पीलिया रोग मिट जाता है। रोगी को मूली, संतरा पपीता, खरबूज, अंगूर और गन्ना आदि खाने को देना चाहिए।
मूली के पत्तों का 80 मिलीलीटर रस निकालकर किसी बर्तन में आग पर चढ़ा दें, जब पानी उबल जाए, तब उसे छानकर उसमें शक्कर मिलाकर खाली पेट पीने से पीलिया रोग मिट जाता है।
25 मिलीलीटर मूली के रस में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग पिसा हुआ नौसादर मिलाकर सुबह-शाम लेने से पीलिया रोग दूर हो जाता है।
1 चम्मच कच्ची मूली का रस तथा उसमें 1 चुटकी जवाखार मिलाकर सेवन करें। कुछ दिनों तक सुबह, दोपहर और शाम को लगातार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
मूली के पत्तों के 100 मिलीलीटर रस में शर्करा मिलाकर सुबह के समय पीने से पीलिया रोग में लाभ होता है। सुबह मूली खाने या इसका रस पीने से भी पीलिया रोग नष्ट होता है।
पीलिया के रोगी को गन्ने के रस के साथ मूली के रस का भी सेवन करना चाहिए, मूली के पत्तों की बिना चिकनाई वाली भुजिया खानी चाहिए।
आंतों के रोग:
मूली का रस आंतों में एण्टीसैप्टिक का कार्य करता हैं।

पथरी :-
30 से 35 ग्राम मूली के बीजों को आधा लीटर पानी में उबाल लें। जब पानी आधा शेष रह जाए तब इसे छानकर पीएं। यह प्रयोग कुछ दिनों तक करने से मूत्राशय की पथरी चूर-चूर होकर पेशाब के साथ बाहर आ जाएगी। यह प्रयोग 2 से 3 महीने निरन्तर जारी रखें। मूली का रस पीने से पित्ताशय की पथरी बनना बंद हो जाती है।
मूली का 20 मिलीलीटर रस हर 4 घंटे में 3 बार रोजाना पीएं तथा इसके पत्ते चबा-चबाकर खाएं। इससे मूत्राशय की पथरी चूर-चूर होकर पेशाब के साथ बाहर आ जायेगी। यह प्रयोग 2-3 महीने करें। मूली का रस पीने से पित्ताशय की पथरी  बनना बंद हो जाती है।
80 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में 30 ग्राम अजमोद मिलाकर रोजाना पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।
मूली में गड्ढ़ा कर उसमें शलगम के बीज डालकर गुन्था आटा ऊपर लपेटकर अंगारों पर सेंक लें, जब पक जाये तब निकालकर आटे को अलग करके मूली को खा लें। इससे पथरी के टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।
मूली का रस निकालकर उसमें जौखार का चूर्ण (पाउडर) आधा ग्राम मिलाकर रोजाना सुबह-शाम खायें। इससे पेडू (नाभि के नीचे का हिस्सा) का दर्द और गैस दूर होती है तथा पथरी गल जाती है।
मूली के पत्तों के रस में शोरा डालकर सेवन करने से पथरी मिटती है।
एक गिलास पानी रात को सोते समय रखें। सुबह उस पानी में 2 ग्राम मूली का रस डालकर पीयें। इसको पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।

मासिक-धर्म की रुकावट, अनियमितता व परेशानियां :-
मूली के बीजों के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में स्त्री को देने से मासिक-धर्म की रुकावट दूर होती है और मासिक-धर्म साफ होता है।
2-2 ग्राम मूली के बीज, गाजर के बीज, नागरमोथा और हथेली भर नीम की छाल को पीस-छानकर गर्म पानी के साथ सेवन करें। इसके सेवन के बाद में दूध का सेवन करना चाहिए। इससे बंद मासिकस्राव (रजोदर्शन) शुरू हो जाता है।
मासिक-धर्म (ऋतुस्राव) के रुकने के कारण चेहरे पर अधिक मुंहासे निकलते हों तो सुबह के समय मूली और उसके कोमल पत्ते चबाकर खाने से आराम मिलता है। मूली के रस का भी सेवन कर सकते हैं।
मूली, गाजर तथा मेथी के बीज 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इस मिश्रण को 10 ग्राम लेकर पानी के साथ सेवन करने से मासिक-धर्म सम्बन्धी शिकायतें दूर हो जाती हैं। 3 ग्राम मूली के बीजों का चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से ऋतुस्राव (मासिक-धर्म का आना) का अवरोध नष्ट होता है।

बवासीर :-
मूली कच्ची खाएं तथा इसके पत्तों की सब्जी बनाकर खाएं। कच्ची मूली खाने से बवासीर से गिरने वाला रक्त (खून) बंद हो जाता है। बवासीर खूनी हो या बादी 1 कप मूली का रस लें। इसमें एक चम्मच देशी घी मिला लें। इसे रोजाना दिन में 2 बार सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।
कोमल मूली के 40-60 मिलीलीटर बने काढ़े  में 1-2 ग्राम पीपर का चूर्ण मिलाकर पीने से बवासीर में आराम आता है।
एक सफेद मूली को काटकर नमक लगाकर रात को ओस में रख दें। इसे सुबह खाली पेट खाएं। मलत्याग के बाद गुदा भी मूली के पानी से धोएं या 125 मिलीलीटर मूली के रस में 100 ग्राम देशी घी की जलेबी एक घंटा भीगने दें। उसके तुरन्त बाद जलेबी खाकर पानी पी लें। इस प्रकार निरन्तर एक सप्ताह यह प्रयोग करने से जीवन भर के लिए प्रत्येक प्रकार की बवासीर ठीक हो जाएगी।
मूली के टुकड़े को घी में तलकर चीनी के साथ खाएं या मूली काटकर उस पर चीनी डालकर रोजाना 2 महीने तक खाने से भी बवासीर में लाभ होता है।
सूखी मूली की पोटली गर्म करके बवासीर के मस्सों पर सिंकाई करने से आराम आता है।
सूरन के चूर्ण को घी में भूनकर, मूली के रस में घोंटकर 1-1 ग्राम की गोलियां बना लें। फिर रोजाना सुबह-शाम 1-1 गोली ताजे पानी के साथ लेने से हर प्रकार की बवासीर नष्ट होती है।
रसौत और कलमी शोरा दोनों को बराबर लेकर, मूली के रस में घोटकर चने के बराबर गोलियां बना लें। रोजाना सुबह-शाम 1 से 4 गोली बासी पानी के साथ खाने से दोनों प्रकार की बवासीर नष्ट हो जाती है।
10-10 ग्राम नीम की निंबौली, कलमी शोरा, रसावत और हरड़ को लेकर बारीक पीस लें, फिर इसे मूली के रस में मिलाकर जंगली बेर के बराबर आकार की गोलियां बना लें। रोजाना सुबह-शाम 1-1 गोली ताजे पानी या मट्ठा के साथ खाने से खूनी बवासीर से खून आना पहले ही दिन बंद हो जाता है और बादी बवासीर 1 महीने के प्रयोग से पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
मूली की जड़ को चाकू या छुरी से गोल-गोल चकतियां बनाकर घी में तलकर मिश्री के साथ खाने से बवासीर में बहुत लाभ होता है।
मूली के रस में नीम की निंबौली की गिरी पीसकर कपूर मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लेप करने से मस्से सूख जाते हैं।
एक अच्छी मोटी मूली लेकर ऊपर की ओर से काटकर चाकू या छुरी से उसे खोखली करके उसमें 20 ग्राम `रसवत´ भरकर मूली के कटे हुए भाग का मुंह बंदकर कपड़े और मिट्टी से अच्छी तरह बंद कर दें। इसे कण्डों की आग में रखकर राख बना लें। दूसरे दिन रसवत निकालकर मूली के रस में कूट कर झड़बेरी के बराबर गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम ताजे पानी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है।
मूली के पत्तों को छाया में सुखाकर बारीक पीस लें, फिर इसमें इसी के समान मात्रा में चीनी, मिश्री या खांड मिलाकर रोजाना बासी मुंह 10 ग्राम की मात्रा में खाने से बवासीर में आराम हो जाता है।
मूली की सब्जी बनाकर खाने से बवासीर और पेट दर्द में आराम मिलता है।
बवासीर में सूखी मूली का 20-50 मिलीलीटर सूप, पानी अथवा बकरी के मांस के सूप में मिलाकर पीने से बवासीर के रोग में आराम आता है।
125 मिलीलीटर मूली के रस में 100 ग्राम जलेबी को मिलाकर एक घंटे तक रखें। एक घंटे बाद जलेबी को खाकर रस को पी लें। इसको पीने से 1 सप्ताह में ही बवासीर का रोग ठीक हो जाता है।
मूली के छोटे-छोटे टुकड़े करके उसे देशी घी में तलकर रोजाना सुबह-शाम खाने से दोनों प्रकार की बवासीर ठीक हो जाती हैं।
सूखे हुए मूली के पत्तों का चूर्ण बनाकर उसमें मिश्री मिलाकर प्रतिदिन खाने से बवासीर ठीक होता है।
मूली का रस निकालकर इसके 20 मिलीलीटर रस में 5 ग्राम घी मिलाकर रोजाना सुबह-शाम पीने से खून का निकलना बंद हो जाता है।

दाद :-
मूली के बीजों को नींबू के रस में पीसकर गर्म करके दाद पर लगाएं। पहले दिन लगाने पर जलन व दर्द होगा, दूसरे दिन यह दर्द कम होगा। ठीक होने पर कोई कष्ट नहीं होगा। यह प्रयोग सूखी या गीली दोनों प्रकार के दाद में लाभदायक है।
मूली के बीजों को नींबू के रस में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है।
शरीफे के फलों के रस में मूली के बीज को पीसकर लगाने से दाद का रोग ठीक हो जाता है।

गले के घाव :-
मूली का रस और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर नमक डालकर गरारे करने से गले के घाव ठीक हो जाते हैं।

अग्निमान्द्य (भूख का कम लगना), अरुचि, पुरानी कब्ज, गैस :-
भोजन के साथ मूली पर नमक, कालीमिर्च डालकर 2 महीने रोजाना खाएं। पेट के रोगों में मूली की चटनी, अचार व सब्जी खाना भी उपयोगी है।

अम्लपित्त (एसिडिटीज) :-
यदि गर्मी के प्रभाव से खट्ठी डकारें आती हो तो 1 कप मूली के रस में मिश्री मिलाकर सेवन करना लाभकारी होता है।
100 मिलीलीटर मूली के रस में 10 मिलीलीटर आंवले का रस या 3 ग्राम आंवले का चूर्ण मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटिज) मे बहुत लाभ होता है।
मूली का रस और कच्चे नारियल के पानी को मिलाकर 250 मिलीलीटर की मात्रा में दिन भर में सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटीज) में काफी आराम आता है।
कोमल मूली को मिश्री मिलाकर खायें या इसके पत्तों के 10-20 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर रोजाना सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटीज) का रोग कम हो जाता है।
मूली के रस में चीनी मिलाकर सेवन करने से पेट की जलन, गर्मी और खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं।
2 चम्मच मूली के रस में थोड़ी-सी मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से खट्टी डकारों से छुटकारा मिल जाता है।
मूली को काटकर सेंधा नमक लगाकर खाली पेट सुबह के वक्त खाने से लाभ होता है, ध्यान रहें कि खांसी की शिकायत हो, तो मूली का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उस समय हानिकारक होगी।

कान का दर्द :-
मूली के पत्तों को पीसकर उसका रस निकाल लें। इसके 50 मिलीलीटर रस को मिलीलीटर ग्राम तिल के तेल में काफी देर तक पका लें। पकने पर रस पूरी तरह से जल जाये तो उस तेल को कपड़े में छानकर शीशी में भरकर रख लें। कान में दर्द होने पर इस तेल को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।
2 से 4 बूंद मूली की जड़ों का रस गर्म करके कान में 2 से 3 बार डालें।

शीतपित्त :-
मूली के जूस का सेवन करने से शीतपित्त रोग ठीक हो जाता है।

घरेलु नुस्खे


1.प्याज के रस को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
2.प्रतिदिन 1 अखरोट और 10 किशमिश बच्चों को खिलाने से बिस्तर में पेशाब करने की समस्या दूर होती है।
3.टमाटर के सेवन से चिढ़चिढ़ापन और मानसिक कमजोरी दूर होती है।यह मानसिक थकान को दूर करमस्तिस्क को तंदरुस्त बनाये रखता है।इसके सेवन से दांतो व् हड्डियों की कमजोरी भी दूर होती है.
4.तुलसी के पत्तो का रस,अदरख का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर 1-1चम्मच की मात्रा में दिन में 3से4 बार सेवन करने से सर्दी,जुखाम व् खांसी दूर होती है।
5.चाय की पट्टी की जगह तेज पत्ते की चाय पीने से सर्दी, जुखाम ,छींके आनानाक बहना ,जलन व् सरदर्द में शीघ्र आराम मिलता है।
6.रोज सुबह खाली पेट हल्का गर्म पानी पीने से चेहरे में रौनक आती है वजन कम होता है, रक्त प्रवाह संतुलित रहता है और गुर्दे ठीक रहते है।
7.पांच ग्राम दालचीनी ,दो लवंग और एक चौथाई चम्मच सौंठ को पीसकर 1 लीटर पानी में उबाले जब यह 250 ग्राम रह जाए तब इसे छान कर दिन में 3 बार पीने से वायरल बुखार में आराम मिलता है।
8.पान के हरे पत्ते के आधे चम्मच रस में 2 चम्मच पानी मिलाकर रोज नाश्ते के बाद पीने सेपेट के घाव व् अल्सर में आराम मिलता है।
9.मूंग की छिलके वाली दाल को पकाकर यदि शुद्ध देशी घी में हींग-जीरे का तड़का लगाकर खाया जाए तो यह वात, पित्त, कफ तीनो दोषो को शांत करती है।
10. भोजन में प्रतिदिन 20 से 30 प्रतिशत ताजा सब्जियों का प्रयोग करने से जीर्ण रोग ठीक होता है उम्र लंबी होती है शरीर स्वस्थ रहता है।
11.भिन्डी की सब्जी खाने से पेशाब की जलन दूर होती है तथा पेशाब साफ़ और खुलकर आता है।
12.दो तीन चम्मच नमक कढ़ाई में अच्छी तरह सेक कर गर्म नमक को मोटे कपडे की पोटली में बांधकर सिकाई करने से कमर दर्द में आराम मिलता है।
13.हरी मिर्च में एंटी आक्सिडेंट होता है जो की शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हैऔर कैंसर से लड़ने में मदद करता है इसमें विटामिन c प्रचुर मात्रा में होता है जो की प्राकृतिक प्रतिरक्षा में सुधार करता है।
14.मखाने को देसी घी में भून कर खाने से दस्तो में बहुत लाभ होता है इसके नियमित सेवन से रक्त चाप , कमर दर्द, तथा घुटने के दर्द में लाभ मिलता है।
15.अधिक गला ख़राब होने पर 5 अमरुद के पत्ते 1 गिलास पानी में उबाल कर थोड़ी देर आग पर पका ठंडा करके दिन में 4 से 5 बार गरारे करने से शीघ्र लाभ होता है।
16.आधा किलो अजवाइन को 4 लीटर पान में उबाले 2 लीटर पानी बचने पर छानकर रखे, इसे प्रतिदिन भोजन के पहले 1 कप पीने से लिवर ठीक रहता है एवशराब पीने की इच्छा नहीं होती.।
17.नीम की पत्तियो को छाया में सुखा कर पीस लें . इस चूर्ण में बराबर मात्रा में कत्थे का चूर्ण मिला ले।इस चूर्ण को मुह के छालो पर लगाकर टपकाने से छाले ठीक होते है।
18.प्रतिदिन सेब का सेवन करने से ह्रदय,मस्तिस्क तथा आमाशय को समान रूप से शक्ति मिलती है तथा शरीर की कमजोरी दूर होती है।
19.20से 25 किशमिश चीनी मिटटी के बर्तन में रात को भिगो कर रख दें।सुबह इन्हें खूब चबा कर खाने से लो ब्लड प्रेसर में लाभ मिलता है व् शरीर पुष्ट होता है।
20. अमरुद में काफी पोषक तत्व होते है .इसके नियमित सेवन से कब्ज दूर होती है और मिर्गी, टाईफाइड , और पेट के कीड़े समाप्त होते है।

काय करावे आणि काय करू नये

देवासमोर लावलेल्या समईची ज्योत  केव्हाही दक्षिणेकडे का  असू नये  ?
उत्तर :-ती यमाची मृत्यू ची दिशा आहे . यमाची पुजा केली जात नाही. फक्त दिवाळीत यम व्दितीयाला यमाचे पुजन केले जाते तेव्हा दक्षिणेला दिवा लावला जातो.

🔔 स्त्रियांनी केव्हाही तुळस का तोडू नये ?
उत्तर :- ही सौभाग्य देणारी आहे म्हणून.

🔔 देव-देवतांना वंदन करताना डोक्यावरील टोपी का काढावी ?
उत्तर :- ब्रह्मरंध्राकडे निर्गुण ईश्वरी उर्जा आकृष्ट होते व ती ग्रहण करण्यासाठी टोपी काढावी .

🔔शिवपिंडीला अर्धीच प्रदक्षिणा का घालावी

उत्तर :- शिवसुत्र आहे महादेवाचे. रद्रगण, पितृगण,लिंगाच्या टोकाला तीर्थ प्रसादासाठी बसलेले असतात .त्याना प्रदक्षिणा होईल म्हणून.

🔔 एकाच घरात दोन शिवलिंगे,
दोन शाळीग्राम,
दोन सुर्यकांत,
दोन चक्रांक, तीन देवी, गणपती व दोन शंख पूजेस का पुजू नयेत ?
उत्तर :-प्रत्येक गोष्टीत एक तत्व असते. आई बाप दोन होऊ शकत नाही एकच असतात अव्दैताची पुजा करतात, व्दैताची पुजा केली जात नाही म्हणून
🔔 गायत्री मंत्र आसनावर बसून जपावा. रस्त्यातून जाता येता किंवा गाडीत का जपू नये ?
उत्तर :-हा मंत्रराज आहे, ज्या मंत्राना बीज असतात, ते मंत्र सोवळ्यातच आसनावर करायचे असतात.  कारण चित्ताची एकाग्रता महत्वाची असते. रस्त्यातून जाता येता किंवा गाडीत जपताना ती एकाग्रता साधत नाही व शरीर दोष येतो अंतर्मुखता साधत नाही.  त्यामुळे मंत्रजपाचे फल मिळत नाही म्हणून ....

🔔 शाळीग्राम पूजावयाचे ते सम पूजावेत. मात्र समांमध्ये दोन का पुजू नयेत ?
उत्तर :- शाळीग्राम हा स्वयंभू आहे. हे विष्णूचे प्रतिक आहे व दोन पुजले तर कर्त्याला उद्वेग, कलह प्राप्त होतो म्हणून ..
.
🔔 निरंजनात तुप व तेल कधीही एकत्र का घालू नये ??
उत्तर :- तूप हे सत्व तत्व व निर्गुण आहे व तेल हे रज तत्व व सगुण आहे . म्हणून हे दोन्ही एकत्र करता येत नाही . नाहीतर तम तत्व वाढेल . राक्षसी संकटे येतील म्हणून .

🔔 देवदेवतांच्या मूर्तीची वा फोटोची तोंडे कधीही दक्षिणेकडे किंवा एकमेकांसमोर का
करू नयेत ?
उत्तर:- त्यांच्या तेजाच्या लहरी स्पंदने समोर फेकली जातात त्यामुळे शत्रुत्वाचा दोष येतो म्हणून ...

🔔 विष्णूच्या मस्तकावर वाहिलेले फुल मनुष्याने आपल्या मस्तकावर का ठेवू नये ?
उत्तर :-फुले ही देवतांची पवित्रके आहेत.  विष्णुतत्त्व व चैतन्य त्या फुलात येते ते शक्तीस्वरुप होते ही शक्ती आपणास सहन होत नाही म्हणून ..

🔔 शिव मंदिरात झांज, सूर्य मंदिरात शंख व देवी मंदिरात बासरी का वाजवू नये ?

उत्तर :-शिवाचा तमभाव आहे व झांजेतुन तमतत्वाचे स्वर उत्पन्न होतात त्यामुळे शिवास विरक्ती येते म्हणून...
सर्य हा अग्नी तत्त्वाचा आहे व शंखनादही अग्नीतत्वाचा आहे दोन्हीही शक्ति एकरूप झाल्यावर रज कणाचे घर्षण होते . सुक्ष्म ज्वाळाची निर्मिती होते व त्यामुळे दाह निर्माण होतो म्हणुन...
देवी मंदिरात बासरी ही नाद पोकळी निर्माण करतो . शक्तीतत्व ह्या नादात पोकळीत रहात नाही . ती हिरण्यगर्भा आहे . ती प्रसूति वैराग्य आहे ..

🔔 आपली जपमाळ व आसन कधीही दुस-यास वापरण्यास का देवू नये ?
उत्तर:- त्यात आपल्या सेवेच्या सात्विक लहरीचे बंधन झालेले असते . ते दुस-यास दिल्यास त्याला ते मिळते व साधनेत त्या आसनावर आळस येतो .....
🔔 देवाला नेहमी करंगळी शेजारील बोटाने गंध का लावावे
उत्तर :- हाताची पाची बोटे ही त्या त्या तत्वाशी निगडीत आहेत .
अंगठा -आत्मा/
तर्जनी -पितर/
मध्यमा-स्वतः/अनामिका -देव/करंगळी -ऋषी /
म्हणून देव बोटानेच देवाला गंध लावावे...

🔔 समईत नेहमी १, ३, ५, ७ अशा विषम वाती का असाव्यात सम का असू नयेत.
उत्तर :-विषम तत्व हे तम आहे त्यामुळे आपल्याकडे येणारे तम ते विषम उसळते व सात्विक लहरी प्रस्थापित करते म्हणून......

🔔 अंगावर फाटलेला कपडा कधीही का शिवू नये.
उत्तर :-पितराना दोष लागतो म्हणून .

🔔 उंब-यावर बसून का शिंकू नये ?
उबरा हा मुळात बसण्यासाठी नाही .
तेथे सर्वतिर्थे बसतात. तिथे घराची सात्विक ऊर्जा स्तंभित असत.े शिंकेने तिला व्यास येतो त्यामुळे अपशकुन घडतो म्हणून..... घडल्यास पाणी शिंपडावे......

🔔 निजलेल्या माणसास का
ओलांडून जावू नये.
उत्तर :- झोपलेला शव असतो म्हणजे शिव असतो म्हणून ..

🔔 मांजराना प्रेत ओलांडून का देवू नये
उत्तर :- प्रेत प्रेतच राहते म्हजे पिशाच्च योनित जाते त्याला मोक्ष प्राप्ती होत नाही म्हणून ..

🔔 रात्रीच्या वेळी मीठ किंवा उडीद का आणू नयेत किंवा दुस-यास का देवू नयेत  ?
उत्तर :- याच्यात करणीतत्व आहेत. आकर्षण क्रिया पटकन होते व बळीतत्त्व आहे म्हणून ....

🔔 सायंकाळी केर का काढु नये ?
उत्तर :-  लक्ष्मीला आवडत नाही .
लक्ष्मी हळूहळू निघून जाते व अलक्ष्मीला आवडते...
🔔 रस्त्यात प्रेत दिसल्यास नेहमी नमस्कार का करावा.
उत्तर :- शव= शिव म्हणून नमस्कार करावा....

🔔 कुणाच्या घरातून परत निघताना जातो असे न म्हणता येतो असे का म्हणावे ?
उत्तर :-येणे घडते नाहीतर कायमचे जाणे होते...

🔔 एका हाताने देवाला नमस्कार का करू नये.
उत्तर :- दश इन्द्रियाचा नमस्कार मह्त्वाचा असतो . पंचतत्त्वाचा नाही ...

पृथ्वी का अमृत.. तिल का तेल.

पृथ्वी का अमृत.. तिल का तेल.
यदि इस पृथ्वी पर उपलब्ध सर्वोत्तम खाद्य पदार्थों की बात की जाए तो तिल के तेल का नाम अवश्य आएगा और यही सर्वोत्तम पदार्थ बाजार में उपलब्ध नहीं है. और ना ही आने वाली पीढ़ियों को इसके गुण पता हैं. क्योंकि नई पीढ़ी तो टी वी के इश्तिहार देख कर ही सारा सामान ख़रीदती है.
और तिल के तेल का प्रचार कंपनियाँ इसलिए नहीं करती क्योंकि इसके गुण जान लेने के बाद आप उन द्वारा बेचा जाने वाला तरल चिकना पदार्थ जिसे वह तेल कहते हैं लेना बंद कर देंगे.
तिल के तेल में इतनी ताकत होती है कि यह पत्थर को भी चीर देता है. प्रयोग करके देखें.... आप पर्वत का पत्थर लिजिए और उसमे कटोरी के जैसा खडडा बना लिजिए, उसमे पानी, दुध, धी या तेजाब संसार में कोई सा भी कैमिकल, ऐसिड डाल दीजिए, पत्थर में वैसा की वैसा ही रहेगा, कही नहीं जायेगा... लेकिन... अगर आप ने उस कटोरी नुमा पत्थर में तिल का तेल डाल दीजिए, उस खड्डे में भर दिजिये.. 2 दिन बाद आप देखेंगे कि, तिल का तेल... पत्थर के अन्दर भी प्रवेश करके, पत्थर के नीचे आ जायेगा. यह होती है तेल की ताकत, इस तेल की मालिश करने से हड्डियों को पार करता हुआ, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है. तिल के तेल के अन्दर फास्फोरस होता है जो कि हड्डियों की मजबूती का अहम भूमिका अदा करता है.
और तिल का तेल ऐसी वस्तु है जो अगर कोई भी भारतीय चाहे तो थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से प्राप्त कर सकता है. तब उसे किसी भी कंपनी का तेल खरीदने की आवश्यकता ही नही होगी. तिल खरीद लीजिए और किसी भी तेल निकालने वाले से उनका तेल निकलवा लीजिए. लेकिन सावधान तिल का तेल सिर्फ कच्ची घाणी (लकडी की बनी हुई) का ही प्रयोग करना चाहिए.
तैल शब्द की व्युत्पत्ति तिल शब्द से ही हुई है। जो तिल से निकलता वह है तैल। अर्थात तेल का असली अर्थ ही है "तिल का तेल".
तिल के तेल का सबसे बड़ा गुण यह है की यह शरीर के लिए आयुषधि का काम करता है.. चाहे आपको कोई भी रोग हो यह उससे लड़ने की क्षमता शरीर में विकसित करना आरंभ कर देता है. यह गुण इस पृथ्वी के अन्य किसी खाद्य पदार्थ में नहीं पाया जाता.
सौ ग्राम सफेद तिल 1000 मिलीग्राम कैल्शियम प्राप्त होता हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छः गुना से भी अधिक कैल्शियम है।
काले और लाल तिल में लौह तत्वों की भरपूर मात्रा होती है जो रक्तअल्पता के इलाज़ में कारगर साबित होती है।
तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है।
तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता। आयुर्वेद चरक संहित में इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना गया है।
तिल में विटामिन  सी छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। तिल विटामिन बी और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर है।
इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स होते हैं जो चना, मूँगफली, राजमा, चौला और सोयाबीन जैसे अधिकांश शाकाहारी खाद्य पदार्थों में नहीं होते। ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम है। यही त्वचा और बालों को भी स्वस्थ रखता है। मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है और कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है।
तिलबीज स्वास्थ्यवर्द्धक वसा का बड़ा स्त्रोत है जो चयापचय को बढ़ाता है।
यह कब्ज भी नहीं होने देता।
तिलबीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं।
तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है।
सीधा अर्थ यह है की यदि आप नियमित रूप से स्वयं द्वारा निकलवाए हुए शुद्ध तिल के तेल का सेवन करते हैं तो आप के बीमार होने की संभावना ही ना के बराबर रह जाएगी. जब शरीर बीमार ही नही होगा तो उपचार की भी आवश्यकता नही होगी. यही तो आयुर्वेद है.. आयुर्वेद का मूल सीधांत यही है की उचित आहार विहार से ही शरीर को स्वस्थ रखिए ताकि शरीर को आयुषधि की आवश्यकता ही ना पड़े.
एक बात का ध्यान अवश्य रखिएगा की बाजार में कुछ लोग तिल के तेल के नाम पर अन्य कोई तेल बेच रहे हैं.. जिसकी पहचान करना मुश्किल होगा. ऐसे में अपने सामने निकाले हुए तेल का ही भरोसा करें. यह काम थोड़ा सा मुश्किल ज़रूर है किंतु पहली बार की मेहनत के प्रयास स्वरूप यह शुद्ध तेल आपकी पहुँच में हो जाएगा. जब चाहें जाएँ और तेल निकलवा कर ले आएँ.

तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।
कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है-
तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।
तनाव को कम करता है-
इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।
हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है।
शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है-
तिल में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिल में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-
तिल में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।
शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-
अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।
अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-
तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है-
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
दूध के तुलना में तिल में तीन गुना कैल्शियम रहता है। इसमें कैल्शियम, विटामिन बी और ई, आयरन और ज़िंक, प्रोटीन की भरपूर मात्रा रहती है और कोलेस्टरोल बिल्कुल नहीं रहता है। तिल का तेल ऐसा तेल है, जो सालों तक खराब नहीं होता है, यहाँ तक कि गर्मी के दिनों में भी वैसा की वैसा ही रहता है.
तिल का तेल कोई साधारण तेल नहीं है। इसकी मालिश से शरीर काफी आराम मिलता है। यहां तक कि लकवा जैसे रोगों तक को ठीक करने की क्षमता रखता है। इससे अगर आप महिलाएं अपने स्तन के नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें, तो स्तन पुष्ट होते हैं। सर्दी के मौसम में इस तेल से शरीर की मालिश करें, तो ठंड का एहसास नहीं होता। इससे चेहरे की मालिश भी कर सकते हैं। चेहरे की सुंदरता एवं कोमलता बनाये रखेगा। यह सूखी त्वचा के लिए उपयोगी है।
 तिल का तेल- तिल विटामिन ए व ई से भरपूर होता है। इस कारण इसका तेल भी इतना ही महत्व रखता है। इसे हल्का गरम कर त्वचा पर मालिश करने से निखार आता है। अगर बालों में लगाते हैं, तो बालों में निखार आता है, लंबे होते हैं।
जोड़ों का दर्द हो, तो तिल के तेल में थोड़ी सी सोंठ पावडर, एक चुटकी हींग पावडर डाल कर गर्म कर मालिश करें। तिल का तेल खाने में भी उतना ही पौष्टिक है विशेषकर पुरुषों के लिए।इससे मर्दानगी की ताकत मिलती है!
हमारे धर्म में भी तिल के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है, जन्म, मरण, परण, यज्ञ, जप, तप, पित्र, पूजन आदि में तिल और तिल का तेल के बिना संभव नहीं है अतः इस पृथ्वी के अमृत को अपनावे और जीवन निरोग बनावे.🙏

चूना : बीमारी में अमृत

चूना : बीमारी में अमृत ☀
〰〰〰〰〰〰〰〰


🔶  "चूना" जो अकसर पान में खाया जाता है, वह सौ में से सत्तर बिमारियों को ठीक कर देता है । गेहूँ के दाने के समान सुबह खाली पेट चूना खाओ । उस समय यह अमृत के समान है । इसी प्रकार गेहूँ के दाने के बराबर चूना गन्ने के रस में मिलाकर पी लेने से बहुत जल्दी पीलिया ठीक हो जाता है ।

🔶  यही नहीं चूना नपुंसकता की सबसे अच्छी दवा है । अगर किसी के शुक्राणु नहीं बनते हों तो उसको अगर गन्ने के रस के साथ चूना पिलाया जाये तो साल, डेढ़ साल में भरपूर शुक्राणु बनने लगेंगे और जिन माताओं के शरीर में अण्डे नहीं बनते, उनकी बहुत अच्छी दवा चूना है ।

🔶  विद्यार्थियों के लिए चूना बहुत लाभदायक है । लम्बाई बढाने के लिए गेहूँ के दाने के बराबर चूना रोज दही में मिलाकर खाना चाहिए । दही नहीं हो तो दाल में मिलाकर खाओ । दाल नहीं है तो पानी में मिलाकर पिओ । इससे लम्बाई बढने के साथ-साथ स्मरण शक्ति भी बहुत अच्छी होती है ।

🔶  जिन बच्चों की बुद्धि कम काम करती है, जो मतिमंद बच्चे हैं, उनकी सबसे अच्छी दवा यह चूना है । जिन बच्चों में बुद्धि कम है, दिमाग देर में काम करता है, देर में सोचते हैं, जिनकी हर चीज स्लो है, यदि उन सभी बच्चों को चूना खिलाया जाये तो वे अच्छे हो जायेंगे ।

🔶  महिलाओं को अपने मासिक धर्म के समय अगर कुछ भी तकलीफ होती है तो उसकी सबसे अच्छी दवा चूना है । जो माताएं, जिनकी उम्र पचास वर्ष हो गयी है और उनका मासिक धर्म बन्द हो गया हो, उनकी सबसे अच्छी दवा चूना है । वे गेहूँ के दाने के बराबर चूना प्रतिदिन दाल में, लस्सी में, नहीं तो पानी में घोलकर पियें, फायदा होगा ।

🔶  यदि कोई महिला गर्भावस्था में है तो उसे हर रोज चूना खाना चाहिए । क्योंकि गर्भवती माता को सबसे ज्यादा केल्शियम की जरुरत होती है और चूना केल्शियम का सबसे बड़ा भण्डार है । एक कप अनार के रस में गेहूँ के दाने के बराबर चूना मिलाकर गर्भवती महिला को नौ महीने तक लगातार हर रोज पिलायें । इससे चार फायदे होंगे  -

🔸पहला फायदा  :  माँ को बच्चे के जन्म के समय कोई तकलीफ नहीं होगी और नॉर्मल डीलिवरी होगी ।

🔸दूसरा फायदा  :  जो बच्चा पैदा होगा, वो बहुत हृष्ट-पुष्ट और तन्दरुस्त होगा ।

🔸तीसरा फ़ायदा  :  जिस बच्चे की माँ ने गर्भावस्था के समय चूना खाया हो, वह बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नहीं होगा ।

🔸चौथा फायदा विशेष लाभदायक है  :  पैदा होने वाला बच्चा बहुत होशियार होगा ।

🔶  चूना घुटने का दर्द ठीक करता है । कमर का दर्द ठीक करता है । कंधे का दर्द ठीक करता है । एक खतरनाक बीमारी है, Spondylitis वो चूना खाने से ठीक हो जाती है । कई बार हमारी रीढ़ की हड्डी में जो मनके होते हैं, उसमें दूरी बढ़ जाती है, एक-दूसरे मनके में फासला आ जाता है, जो चूना खाने से ठीक हो सकता है । यही नहीं, रीड़ की हड्डी की सब बिमारियाँ चूना खाने से ठीक हो सकती हैं । यदि आपकी हड्डी टूट जाये तो भी टूटी हुई हड्डी को जोड़ने की ताकत सबसे ज्यादा चूने में है ।

🔶  मुँह में ठण्डा-गर्म पानी लगता है तो चूना खाओ, बिलकुल ठीक हो जाता है । मुँह में अगर छाले हो गए हों तो चूने का पानी पियो, तुरन्त ठीक हो जाता है ।

🔶  शरीर में जब खून कम हो जाये तो चूना जरुर लेना चाहिए । एनीमिया हो, खून की कमी हो, उसकी सबसे अच्छी दवा है - चूना । चूना पीते रहो - गन्ने के रस में, संतरे के रस में, नहीं तो सबसे अच्छा है अनार के रस में । अनार के रस में चूना पियें, बहुत जल्दी खून बनता है । एक कप अनार का रस और गेहूँ के दाने के बराबर चूना सुबह खाली पेट पियें ।

🔶  भारत के लोग पान में चूना खाते हैं, यह अच्छी बात है । लेकिन यदि उस पान में तम्बाकू खा रहे हैं, फिर तो समझो वे ज़हर ही खा रहे हैं । तम्बाकू ज़हर है और चूना अमृत है । इसलिए पान में चूना खाइए, लेकिन तम्बाकू मत खाइए । और यह भी ध्यान रहे कि पान में चूना लगाकर खाइये, परन्तु उसमें कत्था मत लगाइये, कत्था केन्सर पैदा करता है ।

🔶  पान में चूना डालिये, सोंठ डालिये, इलाइची डालिये, लौंग डालिये, केशर डालिये । ये सब डालिये । लेकिन पान में तम्बाकू, सुपारी और कत्था मत डालिये ।

🔶  घुटने में घिसाव आ गया हो और डॉक्टर कहे कि घुटना बदल दो तो भी जरुरत नहीं, चूना खाते रहिये और हरसिंगार के पत्ते का काढ़ा लीजिए, घुटने बहुत अच्छे काम करने लग जायेंगे ।

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है
और कोई भी अक्षर वैसा क्यूँ है
उसके पीछे कुछ कारण है ,
अंग्रेजी भाषा में ये
बात देखने में नहीं आती |
______________________
क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए,
 क्योंकि इनके उच्चारण के समय
ध्वनि
कंठ से निकलती है।
एक बार बोल कर देखिये |

च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के
समय जीभ
तालू से लगती है।
एक बार बोल कर देखिये |

ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए,
क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के
मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है।
एक बार बोल कर देखिये |


त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के
समय
जीभ दांतों से लगती है।
एक बार बोल कर देखिये |

प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए,
क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के
मिलने
पर ही होता है। एक बार बोल
कर देखिये ।
________________________

हम अपनी भाषा पर गर्व
करते हैं ये सही है परन्तु लोगो को
इसका कारण भी बताईये |
इतनी वैज्ञानिकता
दुनिया की किसी भाषा मे
नही है
जय हिन्द
क,ख,ग क्या कहता है जरा गौर करें....
••••••••••••••••••••••••••••••••••••
क - क्लेश मत करो
ख- खराब मत करो
ग- गर्व ना करो
घ- घमण्ड मत करो
च- चिँता मत करो
छ- छल-कपट मत करो
ज- जवाबदारी निभाओ
झ- झूठ मत बोलो
ट- टिप्पणी मत करो
ठ- ठगो मत
ड- डरपोक मत बनो
ढ- ढोंग ना करो
त- तैश मे मत रहो
थ- थको मत
द- दिलदार बनो
ध- धोखा मत करो
न- नम्र बनो
प- पाप मत करो
फ- फालतू काम मत करो
ब- बिगाङ मत करो
भ- भावुक बनो
म- मधुर बनो
य- यशश्वी बनो
र- रोओ मत
ल- लोभ मत करो
व- वैर मत करो
श- शत्रुता मत करो
ष- षटकोण की तरह स्थिर रहो
स- सच बोलो
ह- हँसमुख रहो
क्ष- क्षमा करो
त्र- त्रास मत करो
ज्ञ- ज्ञानी बनो !!

कृपया इस ज्ञान की जानकारी सभी को अग्र प्रेषित करें